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मैं शिव हूँ

मैं मेघ हूँ, कहीं भी थमता नहीं — अनवरत, अवरुद्ध नहीं। मैं वायु का झोंका हूँ, कहीं भी रुकता नहीं — निरंतर, अचल नहीं। मैं नदी का अविरत जल हूँ, कहीं भी ठहरता नहीं — प्रवाहित, अविचल नहीं। मैं अस्तित्व का प्रतिध्वनित नाद-बिंदु हूँ, शब्दातीत — अनिर्वच्य, व्यक्त नहीं। उस अज्ञेय का आवाहन मंत्र हूँ, निष्फल नहीं — अमोघ! निष्प्रभाव नहीं। किंतु दृश्य जगत भ्रामक हैं, आवरण मात्र हैं — मेघ क्षितिज की रेखा पर स्थिर-सा तैरता दिखता है; वायु पर्वत-शिखरों से टकराकर विराम पाती प्रतीत होती है; नदी समुद्र की असीम शांति में सम्मिलित होकर ठहराव का भ्रम दिलाती है; अस्तित्व अपने होने का साक्ष्य मौन संकेत में देता हैं; अज्ञेय सर्वव्यापी होने पर भी अनुपस्थित-सा लुप्तप्राय-सा, तिरोहित-सा भासता जरूर है। परन्तु, सत्य इससे परे है  — गहनतर और रहस्यमय... समुद्र स्वयं को आकाश में उन्मुक्त कर देता है; उसका जल वाष्प बनकर बादल रचता है। मेघ जलकण समेटे, वर्षा की बूँद बनकर पृथ्वी पर बरसता है। और नदी, उसी जल को समेट फिर समुद्र में विलीन हो जाती है। अस्तित्व का चक्र हर पल हर घड़ी हर प्रहर हर युग में चलायमान रहता है। अज्ञेय स...